स्पर्श II - पद

 कवि परिचय: मीराबाई

मीराबाई भक्ति काल की एक प्रसिद्ध महिला कवयित्री थीं। उनका जन्म 1503 में राजस्थान के चोकड़ी (कुड़की) गाँव में हुआ था। उनका विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से हुआ, लेकिन जल्दी ही उनके पति, पिता और श्वसुर का निधन हो गया। दुखों से भरपूर जीवन के कारण मीरा ने अपना घर छोड़ दिया और भगवान कृष्ण की भक्ति में लग गईं। वे संत रैदास की शिष्या थीं। उन्होंने कृष्ण को ही अपना सब कुछ माना और जीवन भर उनकी भक्ति में लीन रहीं। मीरा ने अपने पदों में कृष्ण से प्रेम, शिकायत, विनती और लाड़ सभी भावों को बहुत सुंदर ढंग से बताया है। उनकी भाषा में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का मेल मिलता है।

मीराबाई

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मीरा के पद पाठ प्रवेश

लोक कथाओं के अनुसार, मीरा अपने जीवन के दुखों से परेशान होकर घर छोड़कर वृंदावन चली गई थीं। वहाँ उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान कृष्ण को समर्पित कर दिया और उनके प्रेम में डूब गईं। मीरा की रचनाओं में भगवान कृष्ण कभी बिना रूप के परमात्मा (निर्गुण), कभी गोपियों के प्यारे श्रीकृष्ण (सगुण), और कभी किसी को न चाहने वाले संत (निर्मोही जोगी) के रूप में दिखाई देते हैं।

इस पाठ में दिए गए दोनों पद मीरा ने अपने भगवान श्रीकृष्ण के लिए ही लिखे हैं। मीरा कभी भगवान की तारीफ करती हैं, कभी उनसे प्यार जताती हैं और कभी उन्हें डांट भी देती हैं। वे भगवान की शक्तियों की याद दिलाती हैं और उन्हें यह भी कहती हैं कि अपने भक्तों का साथ देना उनका कर्तव्य है।

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पाठ का सार

इस पाठ में मीराबाई के दो पद दिए गए हैं, जिनमें उन्होंने अपने आराध्य श्रीकृष्ण (गिरधर गोपाल) को प्रेम, भक्ति और श्रद्धा से पुकारा है। पहले पद में मीरा भगवान से विनती करती हैं कि जैसे उन्होंने पहले अपने भक्तों की मदद की थी, वैसे ही अब वे मीरा की भी मदद करें। वे याद दिलाती हैं कि भगवान ने द्रौपदी की लाज बचाई, नरसिंह रूप लेकर भक्त की रक्षा की और गजराज को बचाया। मीरा खुद को भगवान की दासी मानकर उनसे अपनी पीड़ा हरने की प्रार्थना करती हैं।

दूसरे पद में मीरा कहती हैं कि वे अपने आराध्य श्रीकृष्ण की सेविका बनकर रहना चाहती हैं। वे रोज़ बाग लगाएँगी, प्रभु के दर्शन करेंगी और वृंदावन की गलियों में श्रीकृष्ण की लीलाएँ गाएँगी। वे कहती हैं कि उन्हें भगवान के दर्शन, सुमिरन (स्मरण) और भक्ति की जागीर (धन-संपत्ति) चाहिए। मीरा अपने मन में बसे मोर मुकुट, पीताम्बर पहनने वाले, मुरली बजाने वाले श्रीकृष्ण का सुंदर रूप याद करती हैं। वे चाहती हैं कि आधी रात को भी यमुना के किनारे भगवान उन्हें दर्शन दें, क्योंकि उनका मन श्रीकृष्ण के बिना बहुत अधीर हो रहा है।

इन पदों में मीरा की गहरी भक्ति, प्रेम, समर्पण और आराध्य के प्रति विश्वास झलकता है।

पद से शिक्षा

मीरा बाई के इन पदों से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अगर हमारा विश्वास और भक्ति सच्ची हो, तो भगवान हमेशा हमारे साथ रहते हैं और हमारी परेशानी दूर करते हैं। मीरा ने अपने जीवन में बहुत दुख झेले, फिर भी उन्होंने भगवान कृष्ण पर विश्वास नहीं छोड़ा। वे उन्हें अपने सच्चे दोस्त, मालिक और सहारा मानती थीं। हमें भी सच्चे मन से भगवान पर भरोसा रखना चाहिए और अपने काम को पूरी श्रद्धा और सेवा भाव से करना चाहिए। यह पद हमें सिखाते हैं कि प्रेम और भक्ति से ही जीवन में शांति और सच्चा सुख पाया जा सकता है।

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शब्दार्थ

  • हरि: श्री कृष्ण
  • जन: भक्त
  • भीर: दुख- दर्द
  • लाज: इज्जत
  • चीर: साड़ी, कपड़ा
  • नरहरि: नरसिंह अवतार
  • सरीर: शरीर
  • गजराज: हाथियों का राजा (ऐरावत)
  • कुण्जर: हाथी
  • काटी: मारना
  • लाल गिरधर: श्री कृष्ण
  • म्हारी: हमारी
  • स्याम: श्री कृष्ण
  • चाकर: नौकर
  • रहस्यूँ: रह कर
  • नित: हमेशा
  • दरसण: दर्शन
  • जागीरी: जागीर, साम्राज्य
  • कुंज: संकरी (गलियाँ)
  • पीताम्बर: पीले वस्त्र
  • धेनु: गाय
  • बारी: बगीचा
  • पहर: पहन कर
  • तीरा: किनारा
  • अधीरा: व्याकुल होना
  • सुमरण: स्मरण, याद करना
  • भाव: भावना
  • भगती: भक्ति
  • सरसी: सुंदर, सरस
  • मोहन: मन को मोह लेने वाला (श्री कृष्ण)
  • मुरली: बांसुरी
  • दरसण पास्यूँ: दर्शन प्राप्त करूं
  • बणावं: बनवाना
  • दीज्यो: देना
  • हिवड़ो: हृदय, दिल

Very Short Question Answers: पद

प्रश्न 1: 'काटी कुंजर पीर' के अनुसार कुंजर की क्या पीड़ा थी और वह कैसे दूर हुई?
उत्तर:
मगरमच्छ ने हाथी का एक पैर पकड़ रखा था जिस कारण उसे पीड़ा हो रही थी। परन्तु हाथी उससे अपना पैर नहीं छुड़ा पा रहा था। हाथी ने जब प्रभु का स्मरण किया और विष्णु भगवान ने हाथी का कष्ट दूर करने के लिए मगरमच्छ को मारा था जिससे हाथी की पीड़ा दूर हुई|


प्रश्न 2: कवियत्री का हृदय किसके लिए अधीर है?
उत्तर:
मीरा का हृदय अपने प्रिय श्रीकृष्ण के लिए अधीर है। वे श्रीकृष्ण के दर्शन करना चाहती हैं। श्रीकृष्ण के दर्शन प्राप्त न होने के कारण ही उनका हृदय बेचैन हो उठता है।


प्रश्न 3: मीराबाई ने श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य का वर्णन कैसे किया है?
उत्तर:
मीराबाई कहती हैं कि श्रीकृष्ण के माथे पर मोर के पंखों का मुकुट सुशोभित है और उन्होंने पीले वस्त्र पहने हैं। उनके गले में वैजयंती माला शोभायमान है। श्रीकृष्ण जब बाँसुरी बजाते हैं, तो बहुत मनमोहक लगते हैं।


प्रश्न 4: दासी बनकर मीरा क्या करना चाहती हैं?
उत्तर:
दासी बनकर मीरा श्रीकृष्ण की सेवा करना चाहती हैं। वे उनके समीप रहकर उनके गुणों का गान करना चाहती हैं और वृंदावन की कुंज-गलियों में भक्ति करना चाहती हैं।


प्रश्न 5: कवियत्री किस रंग की साड़ी पहनना चाहती हैं और क्यों?
उत्तर:
कुसुंबी रंग प्रेम का प्रतीक होता है। मीरा कुसुंबी रंग की साड़ी पहनकर श्रीकृष्ण से इसलिए मिलना चाहती हैं ताकि वे अपना प्रेम उनके सामने प्रकट कर सकें।


प्रश्न 6: श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज किस प्रकार बचाई थी?
उत्तर:
जब दुःशासन भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरने का प्रयास कर रहा था तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के वस्त्र को बढ़ाकर उसे अपमानित होने से बचाया था। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई थी|


प्रश्न 7: भाव-भक्ति को जागीर क्यों कहा गया है?
उत्तर:
मीरा श्रीकृष्ण की सच्ची उपासिका थीं। किसी भी भक्त के लिए उसका आराध्य ही सबसे बड़ी जागीर होता है और उसको पाने का साधन है - भक्ति। मीरा भी अपनी भक्ति के माध्यम से श्रीकृष्ण को पाना चाहती थीं। इसी कारण अपनी भाव-भक्ति को सबसे बड़ी जागीर मानती थीं।


प्रश्न 8: मीरा श्रीकृष्ण की सेवा करके वेतन रूप में क्या पाना चाहती हैं?
उत्तर:
मीरा अपने आराध्य श्रीकृष्ण की सेवा करके उनके नाम-स्मरण को वेतन के रूप में पाना चाहती हैं| इससे वे हर समय अपने प्रियतम को याद करती रहें। वे एक क्षण के लिए भी प्रभु से दूर नहीं रहना चाहती हैं।


प्रश्न 9: श्रीविष्णु ने प्रह्लाद की रक्षा किस रूप में की थी? 
उत्तर:
विष्णु भगवान ने प्रह्लाद की रक्षा नृसिंह का अवतार लेकर की थी। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद उनका भक्त था। उन्होंने अत्याचारी हिरण्यकश्यप का वध कर प्रह्लाद की रक्षा की थी|


प्रश्न 10: मीराबाई  श्रीकृष्ण को पाने के लिए क्या-क्या करने को तैयार हैं?
उत्तर:
मीराबाई श्रीकृष्ण को पाने के लिए उनकी दासी बनकर सेवा करना चाहती हैं, उनके समीप रहना चाहती हैं, वृंदावन की कुंज-गलियों में उनके गुणों का गान करना चाहती हैं तथा कुसुंबी साड़ी पहनकर आधी रात को यमुना तट पर उनके दर्शन करना चाहती हैं।

PPT: पद

प्रश्न अभ्यास 

(क) निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1. पहले पद में मीरा ने हरि से अपनी पीड़ा हरने की विनती किस प्रकार की है?
उत्तर: पहले पद में मीरा ने अपनी पीड़ा हरने की विनती इस प्रकार की है कि हे ईश्वर! जैसे आपने द्रौपदी की लाज रखी थी, गजराज को मगरमच्छ रूपी मृत्यु के मुख से बचाया था तथा भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए ही आपने नृसिंह अवतार लिया था, उसी तरह मुझे भी सांसारिक संतापों से मुक्ति दिलाते हुए अपने चरणों में जगह दीजिए।

प्रश्न 2. दूसरे पद में मीराबाई श्याम की चाकरी क्यों करना चाहती हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: मीरा श्री कृष्ण को सर्वस्व समर्पित कर चुकी हैं इसलिए वे केवल कृष्ण के लिए ही कार्य करना चाहती हैं। श्री कृष्ण की समीपता व दर्शन हेतु उनकी दासी बनना चाहती हैं। वे चाहती हैं दासी बनकर श्री कृष्ण के लिए बाग लगाएँ उन्हें वहाँ विहार करते हुए देखकर दर्शन सुख प्राप्त करें। वृंदावन की कुंज गलियों में उनकी लीलाओं का गुणगान करना चाहती हैं। इस प्रकार दासी के रूप में दर्शन, नाम स्मरण और भाव-भक्ति रूपी जागीर प्राप्त कर अपना जीवन सफल बनाना चाहती हैं।

प्रश्न 3. मीराबाई ने श्रीकृष्ण के रुप-सौंदर्य का वर्णन कैसे किया है?
उत्तर: मीराबाई ने श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य का अलौकिक वर्णन किया है कि उन्होंने पीतांबर (पीले वस्त्र धारण किए हुए हैं, जो उनकी शोभा को बढ़ा रहे हैं। मुकुट में मोर पंख पहने हुए हैं तथा गले में वैजयंती माला पहनी हुई है, जो उनके सौंदर्य में चार चाँद लगा रही है। वे ग्वाल-बालों के साथ गाय चराते हुए मुरली बजा रहे हैं।

प्रश्न 4. मीराबाई की भाषा शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: मीराबाई ने अपने पदों में ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती आदि भाषाओं का प्रयोग किया गया है। भाषा अत्यंत सहज और सुबोध है। शब्द चयन भावानुकूल है। भाषा में कोमलता, मधुरता और सरसता के गुण विद्यमान हैं। अपनी प्रेम की पीड़ा को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने अत्यंत भावानुकूल शब्दावली का प्रयोग किया है। भक्ति भाव के कारण शांत रस प्रमुख है तथा प्रसाद गुण की भावाभिव्यक्ति हुई है। मीराबाई श्रीकृष्ण की अनन्य उपासिका हैं। वे अपने आराध्य देव से अपनी पीड़ा का हरण करने की विनती कर रही हैं। इसमें कृष्ण के प्रति श्रद्धा, भक्ति और विश्वास के भाव की अभिव्यंजना हुई है। मीराबाई की भाषा में अनेक अलंकारों जैसे अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, उदाहरण आदि अलंकारों का सफल प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 5. वे श्रीकृष्ण को पाने के लिए क्या-क्या कार्य करने को तैयार हैं?
उत्तर: मीरा श्रीकृष्ण को पाने के लिए उनकी चाकर (नौकर) बनकर चाकरी करना चाहती हैं अर्थात् उनकी सेवा करना चाहती हैं। वे उनके लिए बाग लगाकर माली बनने तथा अर्धरात्रि में यमुना-तट पर कृष्ण से मिलने व वृंदावन की कुंज-गलियों में घूम-घूमकर गोविंद की लीला का गुणगान करने को तैयार हैं।

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(ख) निम्नलिखित पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-

प्रश्न 1. हरि आप हरो जन री भीर।
द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।
भगत कारण रुप नरहरि, धर्यो आप सरीर।

उत्तर: 
काव्य-सौंदर्य-
हे कृष्ण! आप अपने भक्तों की पीड़ा को दूर करो। जिस प्रकार आपने चीर बढ़ाकर द्रोपदी की लाज रखी, व नरसिंह रूप धारण कर भक्त प्रहलाद की पीड़ा (दर्द) को दूर किया, उसी प्रकार आप हमारी परेशानी को भी दूर करो। आप पर पीड़ा को दूर करने वाले हो।

शिल्प-सौंदर्य-

  • भाषा - गुजराती मिश्रित राजस्थानी भाषा
  • अलंकार - उदाहरण अलंकार
  • छंद - "पद"
  • रस - भक्ति रस

प्रश्न 2. बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्जर पीर।
दासी मीराँ लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर।

उत्तर: भाव पक्ष-प्रस्तुत पंक्तियों में मीराबाई अपने आराध्य श्रीकृष्ण का भक्तवत्सल रूप दर्शा रही हैं। इसके अनुसार श्रीकृष्ण ने संकट में फँसे डूबते हुए ऐरावत हाथी को मगरमच्छ से मुक्त करवाया था। इसी प्रसंग में वे अपनी रक्षा के लिए भी श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती हैं।

कला पक्ष

  • राजस्थानी, गुजराती व ब्रज भाषा का प्रयोग है।
  • भाषा अत्यंत सहज वे सुबोध है।
  • तत्सम और तद्भव शब्दों का सुंदर मिश्रण है।
  • दास्यभाव तथा शांत रस की प्रधानता है।
  • भाषा में प्रवाहत्मकता और संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है।
  • सरल शब्दों में भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है।
  • दृष्टांत अलंकार का प्रयोग है। |
  • 'काटी कुण्जर' में अनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न 3. चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची।
भाव भगती जागीरी पास्यूँ, तीनूं बाताँ सरसी।

उत्तर: भाव-सौंदर्य - इन पंक्तियों में मीरा दासी बनकर अपने आराध्य श्रीकृष्ण के दर्शन करना चाहती हैं। इससे उन्हें प्रभु स्मरण, भक्ति रूपी जागीर तथा दर्शनों की अभिलाषा रूपी संपत्ति की प्राप्ति होगी अर्थात् श्रीकृष्ण की भक्ति को ही मीरा अपनी संपत्ति मानती हैं।

शिल्प-सौंदर्य-

  • प्रभावशाली राजस्थानी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  • 'भाव भगती' में भ' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है तथा 'भाव भगती जागीरो' में रूपक अलंकार है।
  • मीराबाई की दास्य तथा अनन्य भक्ति को दर्शाया गया है।
  • "खरची', 'सरसी' में पद मैत्री है।
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भाषा अध्यन 

प्रश्न 1. उदाहरण के आधार पर पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रुप लिखिए-
उदाहरण - भीर - पीड़ा/कष्ट/दुख; री - की
चीर ............... बूढ़ता ...............
धर्यो ............... लगास्यूँ ...............
कुण्जर ............... घणा ...............
बिन्दरावन ............... सरसी ...............
रहस्यूँ ............... हिवड़ा ...............
राखो ............... कुसुम्बी ...............
उत्तर -

चीर-वस्त्रबूढ़ता-डूबते हुए
धर्यो-धारण कियालगास्यूँ-लगाऊँगी
कुण्जर-हाथी, हस्ती
घणा-घना, बहुत
बिन्दरावन-वृंदावने
सरसी-पूर्ण हुई, संपूर्ण हुई
रहस्यूँ-रहूँगींहिवड़ा-हिये हृदय
राखो-रक्षा करो
कुसुम्बी-कौशांबी, लाल

योग्यता विस्तार

प्रश्न 1. मीरा के अन्य पदों को याद करके कक्षा में सुनाइए।
उत्तर: छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2. यदि आपको मीरा के पदों के कैसेट मिल सकें तो अवसर मिलने पर उन्हें सुनिए।
उत्तर: 
छात्र स्वयं करें।

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परियोजना कार्य

प्रश्न 1. मीरा के पदों का संकलन करके उन पदों को चार्ट पर लिखकर भित्ति पत्रिका पर लगाइए।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2. पहले हमारे यहाँ दस अवतार माने जाते थे। विष्णु के अवतार राम और कृष्ण प्रमुख हैं। अन्य अवतारों के बारे में जानकारी प्राप्त करके एक चार्ट बनाइए।
उत्तर:
विष्णु के अन्य दस अवतार

  • मत्स्यावतार
  • कूर्मावतार
  • वाराहावतार
  • वामनावतार
  • नरसिंहावतार
  • परशुरामावतार
  • रामावतार
  • कृष्णावतार
  • बुद्धावतार
  • कल्कि अवतार

Unit Test: पद

समय: 1 घंटा

पूर्णांक: 30

निर्देश: सभी प्रश्नों का प्रयास करें।

  • प्रश्न संख्या 1 से 5 तक 1 अंक का प्रत्येक प्रश्न है।
  • प्रश्न संख्या 6 से 8 तक 2 अंक का प्रत्येक प्रश्न है।
  • प्रश्न संख्या 9 से 11 तक 3 अंक का प्रत्येक प्रश्न है।
  • प्रश्न संख्या 12 और 13 प्रत्येक 5 अंक का प्रश्न है।

प्रश्न 1: पहले पद में मीराबाई ने हरि से अपनी पीड़ा हरने के लिए किन उदाहरणों का सहारा लिया है? (1 अंक)

(i) द्रोपदी की लाज और गजराज की रक्षा

(ii) प्रह्लाद और ध्रुव की भक्ति

(iii) सुदामा और विदुर की सेवा

(iv) गौतम और अहिल्या की मुक्ति

प्रश्न 2: दूसरे पद में मीराबाई श्याम की चाकरी क्यों करना चाहती हैं? (1 अंक)

(i) धन प्राप्त करने के लिए

(ii) निरंतर दर्शन, सुमिरन और भाव भक्ति के लिए

(iii) ऊँचा महल बनाने के लिए

(iv) यमुना तट पर घूमने के लिए

प्रश्न 3: मीराबाई ने श्रीकृष्ण को किस रूप में वर्णित किया है? (1 अंक)

(i) मोर मुगट, पीतांबर और वैजंती माला धारण किए

(ii) शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए

(iii) सफेद वस्त्र और कमंडल लिए

(iv) त्रिशूल और डमरू लिए

प्रश्न 4: पहले पद में मीराबाई ने खुद को क्या कहा है? (1 अंक)

(i) दासी मीराँ

(ii) गिरधर की दासी

(iii) लाल गिरधर की दासी

(iv) हरि की भक्त

प्रश्न 5: दूसरे पद में मीराबाई आधी रात किसके दर्शन के लिए यमुना तट जाती हैं? (1 अंक)

(i) प्रभु गिरधर नागर

(ii) श्याम मोहन

(iii) गिरधर गोपाल

(iv) राधा रमण

प्रश्न 6: पहले पद में मीराबाई की भक्ति की क्या विशेषता दिखाई देती है? संक्षेप में बताएँ। (2 अंक)

प्रश्न 7: दूसरे पद में मीराबाई चाकरी के माध्यम से क्या प्राप्त करना चाहती हैं? (2 अंक)

प्रश्न 8: मीराबाई ने श्रीकृष्ण के रूप का वर्णन कैसे किया है? संक्षेप में बताएँ। (2 अंक)

प्रश्न 9: पहले पद का मुख्य भाव विस्तार से समझाएँ। (3 अंक)

प्रश्न 10: दूसरे पद में मीराबाई चाकरी के लिए क्या-क्या करने को तैयार हैं? विस्तार से बताएँ। (3 अंक)

प्रश्न 11: दोनों पदों में मीराबाई के प्रेम की क्या विशेषताएँ दिखाई देती हैं? (3 अंक)

प्रश्न 12: इन पदों से हमें क्या शिक्षा मिलती है? विस्तार से समझाएँ। (5 अंक)

प्रश्न 13: इन पदों में मीराबाई के भक्ति भाव की विशेषताएँ उदाहरण सहित बताएँ। (5 अंक)


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