स्पर्श II - साखी

 प्रश्न अभ्यास

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए -

प्रश्न 1. मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है?
उत्तर. मीठी वाणी बोलने से हम सभी के चारों ओर का माहौल सुखद बन जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मीठी बोली हमारे अंतःकरण में सकारात्मक भाव भरती है। इससे हमारे मन में क्रोध और घृणा जैसे नकारात्मक भाव कम होते हैं और हम सभी खुश रहते हैं। इससे हमारे आसपास के लोग भी हमसे मिलने वाले समय में सुखी अनुभव करते हैं और हमारे तन को भी शीतलता प्राप्त होती है।

प्रश्न 2. दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर.
दीपक की चमक अंधकार को दूर करती है, इसी तरह भक्ति और ज्ञान की ज्योति मन के अंधकार को दूर करती है। साखी में भक्त नाम के व्यक्ति ने भगवान को जानने के लिए उनके चरणों में ज्ञान का दीपक जलाया। जब उन्हें भगवान का ज्ञान प्राप्त हुआ तो उनके मन के सारे अंधकार दूर हो गए और वह सच्ची भक्ति के साथ भगवान को प्रेम करने लगे। इस रूप में, दीपक जलाना अंधकार को दूर करता है जैसे कि ज्ञान का दीपक मन के अंधकार को दूर करता है।

प्रश्न 3. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?
उत्तर.
ईश्वर कण-कण में व्याप्त है और कण-कण ही ईश्वर है। ईश्वर की चेतना से ही यह संसार दिखाई देता है। चारों ओर ईश्वरीय चेतना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, लेकिन यह सब कुछ हम इन भौतिक आँखों से नहीं देख सकते। जब तक ईश्वर की कृपा से हमें दिव्य चक्षु (आँखें) नहीं मिलते, तब तक हम कण-कण में ईश्वर के वास को नहीं देख सकते हैं और न ही अनुभव कर सकते हैं।

प्रश्न 4. संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ 'सोना' और 'जागना' किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर.
कवि के अनुसार संसार में वो लोग सुखी हैं, जो संसार में व्याप्त सुख-सुविधाओं का भोग करते हैं और दुखी वे हैं, जिन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो गई है। 'सोना' अज्ञानता का प्रतीक है और 'जागना' ज्ञान का प्रतीक है। जो लोग सांसारिक सुखों में खोए रहते हैं, जीवन के भौतिक सुखों में लिप्त रहते हैं वे सोए हुए हैं और जो सांसारिक सुखों को व्यर्थ समझते हैं, अपने को ईश्वर के प्रति समर्पित करते हैं वे ही जागते हैं। वे संसार की दुर्दशा को दूर करने के लिए चिंतित रहते हैं।

प्रश्न 5. अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?
उत्तर.
अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने बताया है कि हमें अपने आस-पास निंदक रखने चाहिए ताकि वे हमारी त्रुटियों को बता सके। निंदक हमारे सबसे अच्छे हितैषी होते हैं। उनके द्वारा बताए गए त्रुटियों को दूर करके हम अपने स्वभाव को निर्मल बना सकते हैं।

प्रश्न 6. 'ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होई' -इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर.
इन पंक्तियों के माध्यम से कवि ने प्रेम की महत्ता बताई है। यह उसका संदेश है कि ईश्वर को पाने के लिए सबसे आवश्यक चीज प्रेम है। जब तक हम प्रेम से नहीं जुड़ेंगे, तब तक हम ईश्वर को पाने से दूर होंगे। यह उसका संदेश है कि ज्ञान पाने के लिए बड़े-बड़े पोथे या ग्रन्थ पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। केवल परमात्मा का नाम स्मरण करने से ही सच्चा ज्ञानी बना जा सकता है। इसलिए, यह पंक्तियाँ भावात्मक और गंभीर संदेश देती हैं।

प्रश्न 7. कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर.
कबीर ने अपनी साखियाँ सधुक्कड़ी भाषा में लिखी है। इनकी भाषा मिलीजुली है। इनकी साखियाँ संदेश देने वाली होती हैं। वे जैसा बोलते थे वैसा ही लिखा है। लोकभाषा का भी प्रयोग हुआ है;जैसे- खायै, नेग, मुवा, जाल्या, आँगणि आदि भाषा में लयबद्धता, उपदेशात्मकता, प्रवाह, सहजता, सरलता शैली है।

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(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए -

प्रश्न 1. बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
उत्तर.
इस पंक्ति का अर्थ है कि भगवान के प्रति प्रेम रूपी विरह का सर्प किसी व्यक्ति के हृदय में बस जाता है। इस सर्प का प्रभाव इतना गहरा होता है कि उस पर कोई मंत्र असर नहीं करता। इस पंक्ति से समझना चाहिए कि भगवान के विरह में कोई भी जीव सामान्य नहीं रहता है और उस पर किसी भी बात का कोई असर नहीं होता है। यह पंक्ति भक्ति के मार्ग पर चलने वाले लोगों को समझाती है कि भगवान के विरह का दुःख नहीं होता। भक्ति के माध्यम से भगवान के प्रति विश्वास और प्रेम बढ़ाना चाहिए

प्रश्न 2. कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
उत्तर.
इस पंक्ति में कबीर कहते हैं कि जिस प्रकार हिरण अपनी नाभि से आती सुगंध पर मोहित रहता है परन्तु वह यह नहीं जानता कि यह सुगंध उसकी नाभि में से आ रही है। वह उसे इधर-उधर ढूँढता रहता है। उसी प्रकार अज्ञानी भी वास्तविकता से अनजान रहता है। वे आनंदस्वरूप ईश्वर को प्राप्त करने के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में लिप्त रहता है। वह आत्मा में विद्यमान ईश्वर की सत्ता को पहचान नही पाता।

प्रश्न 3. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
उत्तर.
जब तक मनुष्य में अज्ञान रुपी अंधकार छाया होता है तब वह ईश्वर को नहीं पा सकता। अध्याय में साखी के माध्यम से कबीर द्वारा अहंकार और ईश्वर के साथ-साथ रहने की मुश्किलता का वर्णन किया गया है। इस पंक्ति में अहंकार को अंधकार के रूप में वर्णित किया गया है, जो हमें ईश्वर से दूर करता है। जब हम ईश्वर की प्राप्ति करते हैं, तब अहंकार दूर हो जाता है और हम जीवन में उदारता, समझदारी, और संतोष की स्थिति में पहुंचते हैं। कबीर द्वारा यह प्रतिबद्धता हमें साधने के लिए दी गई है कि हम अपने अहंकार को छोड़ कर ईश्वर को प्राप्त करें और उससे गहरे संबंध बनाए रखें।

प्रश्न  4. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
उत्तर.
इस दोहे में कबीर ने बताया है कि एक व्यक्ति जो बड़े-बड़े शास्त्रों को पढ़ता है या ज्ञानी होने की भावना रखता है, वह सच्चा ज्ञानी नहीं होता। वास्तव में, ज्ञान वह होता है जो हमें सच्ची भक्ति और प्रेम से प्राप्त होता है। इस साखी से हमें यह सीख मिलती है कि वास्तव में ज्ञान का मूल आधार हमारी सच्ची भक्ति और प्रेम होता है। यह हमें यह भी बताता है कि ज्ञान को प्राप्त करने के लिए अध्ययन से ज्यादा अनुभव और सच्ची भक्ति की आवश्यकता होती है।

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भाषा अध्यन

प्रश्न 1. पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रुप उदाहरण के अनुसार लिखिए।
उदाहरण - जिवै - जीना

औरन, माँहि, देख्या, भुवंगम, नेड़ा, आँगणि, साबण, मुवा, पीव, जालौं, तास।
उत्तर.

  1. जिवै - जीना
  2. औरन - औरों को
  3. माँहि - के अंदर (में)
  4. देख्या - देखा
  5. भुवंगम - साँप
  6. नेड़ा - निकट
  7. आँगणि - आँगन
  8. साबण - साबुन
  9. मुवा - मुआ
  10. पीव - प्रेम
  11. जालौं - जलना
  12. तास - उसका

योग्यता विस्तार

प्रश्न 1. 'साधु में निंदा सहन करने से विनयशीलता आती है तथा व्यक्ति को मीठी व कल्याणकारी वाणी बोलनी चाहिए'-इन विषयों पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित कीजिए।
उत्तर. छात्र परिचर्चा का आयोजन स्वयं करें।

प्रश्न 2. कस्तूरी के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर. मृगों की एक प्रजाति होती है-कस्तूरी मृग। ऐसा माना जाता है कि इस प्रजाति के मृगों की नाभि में कस्तूरी होती है जो निरंतर अपनी महक बिखेरती रहती है। इस कस्तूरी के बारे में खुद मृग को कुछ पता नहीं होता है। वे इस महकदार वस्तु को खोजते हुए यहाँ-वहाँ घूमते-फिरते हैं।

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परियोजना कार्य

प्रश्न 1. मीठी वाणी/बोली संबंधी व ईश्वर प्रेम संबंधी दोहों का संकलन कर चार्ट पर लिखकर भित्ति पत्रिका पर लगाइए।
उत्तर. 
मीठी वाणी/बोली संबंधी दोहे-
(क) बोली एक अमोल है जो कोई बोले जानि ।
हिए तराजू तौलि के तब मुँह बाहर आनि ।।
(ख) कागा काको सुख हरै, कोयल काको देय।
मीठे वचन सुनाय के, जग अपनो करि लेय ।।
(ग) मधुर वचन है औषधी कटुक वचन है तीर ।
स्रवण द्वार हवै संचरै सालै सकल शरीर ।।

ईश्वर प्रेम संबंधी दोहा-
(घ) रहिमन बहु भेषज करत, व्याधि न छाँड़त साथ ।
खग मृग बसत अरोग बन हरि अनाथ के नाथ ।।
अन्य दोहों का संकलन छात्र स्वयं करें।

प्रश्न 2. कबीर की साखियों को याद कीजिए और कक्षा में अंत्याक्षरी में उनका प्रयोग कीजिए।
उत्तर. छात्र दोहे कंठस्थ करें तथा अंत्याक्षरी खेलें।

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Very Short Questions: साखी

1. ऐसी बाँणी बोलिये, ... औरन कौ सुख होइ।।
कस्तूरी कुंडलि बसै, ... दुनियाँ देखै नाँहि।।

(क) मनुष्य को कैसी वाणी बोलनी चाहिए?
उत्तर::
मनुष्य को मीठी वाणी बोलनी चाहिए|

(ख) मीठी वाणी बोलने से सुनने वालों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर:
मीठी वाणी बोलने से सुनने वालों को सुख और शान्ति प्राप्त होती है|

(ग) मृग कस्तूरी को कहाँ ढूँढता रहता है?
उत्तर: मृग कस्तूरी को जंगल में ढूँढता रहता है|

(घ) अज्ञानी व्यक्ति ईश्वर को कहाँ-कहाँ  ढूँढता है?
उत्तर: अज्ञानी व्यक्ति ईश्वर को विभिन्न धार्मिक स्थानों में ढूँढता रहता है|

2. जब मैं था तब हरि नहीं, ... जब दीपक देख्या माँहि।।
सुखिया सब संसार है, .... जागै अरु रोवै।।

(क) मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति कब होती है?
उत्तर: जब मनुष्य के मन से अंहकार का नाश होता है तब ईश्वर की प्राप्ति होती है|

(ख) दीपक जलाने से क्या होता है?

उत्तर: दीपक जलाने से आस-पास का अन्धकार मिट जाता है और प्रकाश फ़ैल जाता है|

(ग) कबीर के अनुसार दुनिया क्यों सुखी है?
उत्तर: कबीर के अनुसार दुनिया इसलिए सुखी है क्योंकि वो केवल खाने और सोने का काम करती है, उन्हें किसी प्रकार की चिंता नहीं है|

(घ) कबीर क्यों दुखी हैं?
उत्तर: कबीर इसलिए दुखी हैं क्योंकि प्रभु को पाने की आशा में हमेशा चिंता में रहते हैं।

3. बिरह भुवंगम तन बसै, ... जिवै तो बौरा होइ।।
निंदक नेडा राखिये, ... निरमल करै सुभाइ।।

(क) किस स्थिति में व्यक्ति पर कोई मन्त्र का असर नहीं होता?
उत्तर:
जब किसी मनुष्य के शरीर के अंदर अपने प्रिय से बिछड़ने का साँप बसता है तब उसपर कोई मन्त्र का असर नहीं होता|

(ख) ईश्वर वियोगी की हालत कैसी हो जाती है?
उत्तर:
ईश्वर वियोगी की दशा पागलों की तरह हो जाती है?

(ग) निंदा करने वाले व्यक्ति को कहाँ रखना चाहिए?
उत्तर: निंदा करने वाले व्यक्ति को सदा अपने पास रखना चाहिए|

(घ) हम बिन साबुन-पानी के निर्मल कैसे रह सकते हैं?
उत्तर: निंदक को सदा अपने पास रखकर हम बिन साबुन-पानी के निर्मल रह सकते हैं|

4. पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, ... पढ़ै सु पंडित होई।।
हम घर जाल्या आपणाँ, ... जे चले हमारे साथि।।

(क) कबीर के अनुसार कौन ज्ञानी नहीं बन पाया?
उत्तर:
कबीर के अनुसार मोटी-मोटी पुस्तकें पढ़ने वाले व्यक्ति ज्ञानी नहीं बन पाए|

(ख) कबीर के अनुसार पंडित कौन है?
उत्तर:
कबीर के अनुसार जिसने प्रभु का एक अक्षर भी पढ़ लिया है, वह पंडित है| 

(ग) कबीर ने ज्ञान कैसे प्राप्त किया है?
उत्तर:
कबीर ने मोह-माया रूपी घर को जलाकर ज्ञान प्राप्त किया है|

(घ) कबीर के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए क्या करना होगा?
उत्तर:
कबीर के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए मोह-माया के बंधनों से आजाद होना होगा|

अति लघु उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न 1: मीठी वाणी बोलने से क्या होता है?
उत्तर:
मीठी वाणी बोलने से सुनने वाले के मन से क्रोध और घृणा की भावना का नाश होता हैं। साथ ही खुद के तन और अपने हृदय को भी शीतलता मिलता है।

प्रश्न 2: मृग कस्तूरी को वन में क्यों ढूँढता रहता है?
उत्तर: कस्तूरी हिरण के नाभि में होती है परन्तु इस बात से अनजान हिरन कस्तूरी के सुगंध में मोहित होकर वन में ढूँढता रहता है|

प्रश्न 3: ईश्वर कहाँ निवास करता है और मनुष्य उसे कहाँ ढूँढता है?
उत्तर: ईश्वर प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निवास करता है परन्तु अज्ञानता के कारण मनुष्य उसे देख नहीं पाता इसलिए मनुष्य ईश्वर को मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारे और तीर्थ स्थलों में जाकर ढूँढता है।

प्रश्न 4: हमें निंदक को अपने पास क्यों रखना चाहिए?
उत्तर: हमें निंदक को अपने पास रखना चाहिए क्योंकि वे हमारे बुराइयों को बतायेंगे जिसे सुनकर हम उन बुराइयों को दूर कर पायेंगे| इस तरह हमारा स्वभाव बिना साबुन-पानी के स्वच्छ हो जाएगा|

प्रश्न 5: कबीर की साखियों का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: कबीर की साखियों का मुख्य उद्देश्य जीवन को सही तरीके से जीने की शिक्षा देना है| कबीर ने इन साखियों में अपने प्रत्यक्ष ज्ञान का संकलन किया है जिससे मनुष्य जीवन के आदर्श मूल्यों को सीख सकता है| इनमें कबीर ने आडंबरों पर गहरी चोट की है और जीवन वास्तविक उद्देश्य यानी ईश्वर को जानने पर ध्यान दिया है|

प्रश्न 6: कबीर के अनुसार सच्चा ज्ञान क्या है?
उत्तर:
कबीर के अनुसार पुस्तकों द्वारा पाया गया ज्ञान व्यर्थ है| सच्चा ज्ञान ईश्वर को जानना है क्योंकि वही एकमात्र सत्य है और कण-कण में व्याप्त है|

प्रश्न 7: 'ज्ञान प्राप्ति' का मार्ग कठिन क्यों है?
उत्तर:
'ज्ञान प्राप्ति' का मार्ग कठिन इसलिए है क्योंकि इसपर चलने के लिए हमें मोह-माया के बंधनों से आजाद होना पड़ता है| सुख और इससे जुड़ी सामग्री का त्याग करना पड़ता है|


प्रश्न. 8. मृग कस्तूरी को वन में क्यों ढूँढता फिरता है? 
उत्तरः
कस्तूरी मृग की नाभि में होती है किन्तु इस बात से अनजान वह उसकी सुगन्ध से उन्मत्त होकर उसे वन में खोजता है।

प्रश्न. 9. मृग किसका प्रतीक है? 
उत्तरः
मृग अज्ञानी जीव का प्रतीक है।

प्रश्न. 10. सच्चा भक्त किसे कहा गया है ? 
उत्तरः
कबीर के अनुसार, सच्चा भक्त वह है जो प्रभु के विरह में घायल हो, जिसने प्रभु के प्रेम का अनुभव किया हो। जो प्रियतम के मर्म का ज्ञाता हो।

प्रश्न. 11. कबीर के अनुसार ईश्वर का निवास कहाँ है ? 
उत्तरः
कबीर के अनुसार ईश्वर कण-कण में समाया हुआ है। वह प्रत्येक हृदय में रचा-बसा हुआ है। जैसा कि उन्होंने कहा है-ऐसे घटि-घटि राम हैं, दुनिया देखे नाँहि।

प्रश्न. 12. ईश्वर कण-कण में व्याप्त है पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते ?
उत्तरः
ईश्वर कण-कण में व्याप्त है पर हम उसे उसी प्रकार नहीं देख पाते हैं, जैसे कस्तूरी मृग अपनी नाभि में स्थित कस्तूरी को ढूँढ़ नहीं पाता और वह उसे (कस्तूरी को) वन-वन (जंगल-जंगल) खोजता फिरता है।

प्रश्न. 13. ईश्वर से साक्षात्कार की अनुभूति कब होती है ? 
उत्तरः हृदय से अहंकार समाप्त हो जाने पर ईश्वर से साक्षात्कार की अनुभूति होती है।

प्रश्न. 14. कवि ने किस अंधकार के मिटने की बात कही है ? 
उत्तरः
कवि ने अज्ञान के अन्धकार के मिटने की बात कही है।

प्रश्न. 15. किस स्थिति में मनुष्य पर मंत्र के उपचार का लाभ नहीं होता ? 
उत्तरः जब मनुष्य ईश्वर के विरह में व्याकुल होता है तब उसे किसी भी मंत्र के उपचार से लाभ नहीं होता।

कवि का परिचय: कबीर

कबीर एक प्रसिद्ध संत और कवि थे। उनका जन्म 1398 में काशी (अब वाराणसी) में हुआ माना जाता है। उन्होंने गुरु रामानंद से शिक्षा ली और 120 वर्ष तक जीवित रहे। जीवन के आखिरी साल उन्होंने मगहर में बिताए और वहीं उनका निधन हुआ। कबीर ने अपने दोहों और साखियों के ज़रिए समाज को सही रास्ता दिखाने का काम किया। वे ईश्वर को एक मानते थे और पूजा-पाठ के दिखावे के खिलाफ थे। कबीर ने अनुभव से ज्ञान लिया और उसी को अधिक महत्व दिया। उनकी भाषा आसान और लोगों की बोलचाल वाली थी, जिससे उनकी बातें सबको समझ में आती थीं

कविता का सार

इस कविता में संत कबीर हमें अच्छी बातें बोलने, अपने अहंकार को छोड़ने और दूसरों को सुख देने की सीख देते हैं। वे कहते हैं कि भगवान हमारे अंदर ही हैं, लेकिन हम बाहर ढूंढते रहते हैं। जब तक हम खुद में ही उलझे रहते हैं, तब तक हमें ईश्वर नहीं मिलते। लेकिन जब हम अपने अहं को छोड़ देते हैं, तब हमें सच्चा ज्ञान और ईश्वर का अनुभव होता है।

कबीर यह भी बताते हैं कि दुनिया में सभी लोग सोने-खाने में मस्त हैं, लेकिन जो सच्चा भक्त होता है, वह भगवान की याद में जागता और रोता है। वे विरह (जुदाई) के दर्द को सांप की तरह बताते हैं, जिसे राम के नाम का कोई भी मंत्र ठीक नहीं कर सकता। वे निंदा करने वाले को भी पास रखने की सलाह देते हैं क्योंकि वह हमारी गलतियों को बताकर हमें सुधारने में मदद करता है।

अंत में कबीर कहते हैं कि केवल किताबें पढ़ने से कोई विद्वान नहीं बनता। सच्चा ज्ञान तो अनुभव से मिलता है। वे अपने पुराने जीवन को छोड़कर नए सच्चे रास्ते पर चलने का संकल्प लेते हैं।

कविता की व्याख्या

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काव्यांश 1

ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि हमें ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार न हो। ऐसी वाणी न केवल हमारे मन और शरीर को शांत और ठंडा करती है, बल्कि दूसरों को भी सुख और शांति का अनुभव कराती है।

काव्यांश 2

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै वन माँहि। 
ऐसैं घटि-घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहि।।

व्याख्या: यहाँ कबीर जी ईश्वर की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कहा है कि कस्तूरी हिरन की नाभि में होती है लेकिन इससे अनजान हिरन उसके सुगंध के कारण उसे पूरे जंगल में ढूंढ़ता फिरता है ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निवास करते हैं परन्तु मनुष्य इसे वहाँ नही देख पाता। वह ईश्वर को मंदिर-मस्जिद और तीर्थ स्थानों में ढूंढ़ता रहता है।

काव्यांश 3

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नांहि।
सब अँधियारा मिटी गया, जब दीपक देख्या माँहि।।

व्याख्या: यहाँ कबीर कह रहे हैं कि जब तक मनुष्य के भीतर अहंकार बना रहता है, तब तक उसे ईश्वर की अनुभूति नहीं होती। जैसे ही उसका अहंकार समाप्त होता है, उसे ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है। जैसे दीपक के जलते ही अंधकार दूर हो जाता है, वैसे ही अहंकार मिटने पर आत्मज्ञान का प्रकाश फैलता है। यहाँ "अहंकार" को अंधकार और "दीपक" को ईश्वर का प्रतीक माना गया है।

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काव्यांश 4

सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।।

व्याख्या: कबीर जी कहते हैं कि संसार के लोग सुखी हैं क्योंकि वे केवल खाने और सोने में लगे रहते हैं और उन्हें ईश्वर की प्राप्ति की चिंता नहीं होती। परंतु कबीरदास स्वयं को दुखी कहते हैं क्योंकि वे प्रभु-वियोग में रात-भर जागते हैं और रोते रहते हैं। उन्हें ईश्वर के दर्शन की तड़प सताती है, इसलिए वे सच्चे अर्थों में प्रभु-प्रेम में व्याकुल हैं।

काव्यांश 5

बिरह भुवंगम तन बसै, मन्त्र ना लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ।।

व्याख्या: जब किसी मनुष्य के शरीर के अंदर अपने प्रिय से बिछड़ने का साँप बसता है तो उसपर कोई मन्त्र या दवा का असर नहीं होता ठीक उसी प्रकार राम यानी ईश्वर के वियोग में मनुष्य भी जीवित नही रहता। अगर जीवित रह भी जाता है तो उसकी स्थिति पागलों जैसी हो जाती है।

काव्यांश 6

निंदक नेडा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणी बिना, निरमल करै सुभाइ।।

व्याख्या: कबीर जी कहते हैं कि निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने पास रखना चाहिए, यदि संभव हो तो उसके लिए अपने आँगन में कुटिया बनवाकर रखना चाहिए। क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के ही हमारे स्वभाव को निर्मल कर देता है। उसका तात्पर्य यह है कि निंदा करने वाला हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधारने में मदद करता है।

काव्यांश 7

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया ना कोइ।
ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होई।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि संसार में बहुत लोग मोटी-मोटी पोथियाँ पढ़ते-पढ़ते मर गए, लेकिन कोई भी सच्चा ज्ञानी (पंडित) नहीं बन पाया। यदि कोई व्यक्ति प्रेम और भक्ति से ईश्वर के नाम का एक अक्षर भी समझ लेता है, तो वही सच्चा पंडित कहलाता है। यहाँ पंडित का अर्थ विद्वान से नहीं, बल्कि ईश्वर को जानने वाले सच्चे ज्ञानी से है।

काव्यांश 8

हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराडा हाथि। 
अब घर जालौं तास का, जे चले हमारे साथि।।

व्याख्या: कबीरदास कहते हैं कि उन्होंने अपने घर (अर्थात् मोह-माया और सांसारिक बंधनों) को स्वयं जला दिया है और अब उनके हाथ में ज्ञान की मशाल है। अब जो भी व्यक्ति उनके साथ चलना चाहता है, उसे भी अपने भीतर के मोह-माया के घर को जलाना होगा। यानी सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए सांसारिक मोह से मुक्त होना आवश्यक है।

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कविता से शिक्षा

इस कविता से हमें यह सिखने को मिलता है कि हमें मीठा और अच्छा बोलना चाहिए जिससे दूसरों को सुख मिले और मन शांत हो। ईश्वर हर जगह है, लेकिन हम उसे देख नहीं पाते। जब हमारे अंदर अहंकार होता है, तब हमें ईश्वर नहीं मिलते, पर जब हम अपने अहंकार को छोड़ देते हैं, तो ईश्वर हमारे भीतर ही दिखाई देते हैं। जो सच्चे प्रेम में होता है, वह विरह में दुखी रहता है और चैन से नहीं सो पाता। सच्चा ज्ञान किताबों से नहीं, अनुभव और ईश्वर की भक्ति से आता है। कबीर हमें बताते हैं कि पहले खुद को सुधारो और फिर दूसरों को राह दिखाओ।

शब्दार्थ

  • बाँणी: वाणी
  • आपा: अहंकार
  • सीतल: ठंडा
  • कस्तूरी: एक सुगन्धित पदार्थ
  • कुंडलि: नाभि
  • माँहि: भीतर
  • हरि: भगवान
  • मिटि: मिटना
  • सुखिया: सुखी
  • अरु: और
  • बिरह: वियोग
  • भुवंगम: साँप
  • बौरा: पागल
  • निंदक: बुराई करने वाला
  • नेड़ा: निकट
  • आँगणि: आँगन
  • साबण: साबुन
  • पाँणी: पानी
  • निरमल: पवित्र
  • सुभाइ: स्वभाव
  • पोथी: ग्रन्थ
  • मुवा: मर गया
  • भया: हुआ
  • अषिर: अक्षर
  • पीव: प्रियतम या ईश्वर
  • जाल्या: जलाया
  • आपणाँ: अपना
  • मुराडा: जलती हुई लकड़ी
  • जालौं: जलाऊँ
  • तास का: उसका

'साखी' शब्द का अर्थ

'साखी' शब्द 'साक्षी' शब्द का ही तद्भव रूप है। 'साक्षी' शब्द साक्ष्य से बना है, जिसका अर्थ होता है - प्रत्यक्ष ज्ञान। यह ज्ञान गुरु अपने शिष्य को प्रदान करता है। 'साखी' वस्तुतः दोहा छंद है जिसका लक्षण है 13 और 11 के विश्राम से 24 मात्रा और अंत में जगण। प्रस्तुत पाठ की साखियाँ प्रमाण हैं कि सत्य की साक्षी देता हुआ ही गुरु शिष्य को जीवन के तत्वज्ञान की शिक्षा देता है। यह शिक्षा जितनी प्रभावपूर्ण होती है उतनी ही याद रह जाने योग्य भी।

साखियों का प्रतिपाद्य

कबीर इस पाठ में संकलित साखियों के माध्यम से कबीरदास जी मनुष्य को नीति का संदेश देते हैं।
पहली साखी के द्वारा कबीरदास जी मीठी वाणी के महत्व पर प्रकाश डालते हैं। मीठी वाणी बोलने वाले तथा सुनने वाले दोनों को सुख पहुँचाती है।
दूसरी साखी में कबीरदस जी कहते हैं कि ईश्वर तो प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निवास करता है, परंतु मनुष्य उसे चारों ओर ढूँढ़ता फिरता है। जिस प्रकार कस्तूरीमृग अपनी कस्तूरी को सारे वन में ढूँढ़ता फिरता है, उसी प्रकार मनुष्य ईश्वर को अन्यत्रा ढूँढ़ता रहता है।
तीसरी साखी में कबीरदास जी कहते हैं कि अहं के मिटने पर ही ईश्वर की प्राप्ति होती है तथा अज्ञान रूपी अंध्कार मिट जाता है।
चैाथी साखी में कबीरदास जी कहते हैं कि साध्क 'विचारक' ही दुखी और चिंतामग्न है तथा वह ईश्वर के लिए सदा व्याकुल रहता है।
पाँचवीं साखी में कबीरदास जी विरह की व्याकुलता के विषय में बताते हैं कि राम यानी ईश्वर के विरह में व्याकुल व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता। अगर वह जीवित रहता भी है तो वह पागल हो जाता है।
छठी साखी में कबीरदास जी निंदक का महत्व स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि निंदक साबुन तथा पानी के बिना ही स्वभाव को निर्मल कर देता है।
सातवीं साखी में कबीरदास जी केवल पुस्तक पढ़-पढ़कर पंडित बने लोगों की निंदा करते हैं तथा सच्चे मन से प्रभु का नाम स्मरण करने को महत्व देते हैं।
आठवीं साखी में कबीरदास जी विषय-वासना रूपी बुराइयों को दूर करने की बात करते हैं।
इस प्रकार सभी साखियाँ मनुष्य को नीति संबंधी संदेश देती हैं।

1.

ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ।।

व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि हमें ऐसी बोली बोलनी चाहिए जो हमारे हृदय के अहंकार को मिटा दे अर्थात जिसमें हमारा अहं न झलकता हो, जो हमारे शरीर को भी ठंडक प्रदान करे तथा दूसरों को भी सुख प्रदान करे। तात्पर्य यह है कि हमारे तन को शीतलता प्रदान करे तथा सुनने वाले 'श्रोता' को भी मानसिक सुख प्रदान करे।
काव्य-सौंदर्य:
भाव पक्ष: 

  • वाणी की मधुरता का महत्व बताया गया है।

कला पक्ष:

  • सहज एवं सरल भाषा का प्रयोग किया गया है। भाषा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।
  • 'बाँणी बोलिए' में अनुप्रास अलंकार है।
  • सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया गया है।

2.

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै़ बन माँहि।
 ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहि।।

व्याख्या: कबीरदास जी उदाहरण द्वारा ईश्वर की महत्ता स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि कस्तूरी तो हिरन की नाभि में स्थित होती है, परंतु वह उसे वन में ढूँढ़ता पिफरता है अर्थात वह अपने अंदर बसी कस्तूरी को नहीं पहचान पाता है। यही स्थिति मनुष्य की भी है। ईश्वर तो प्रत्येक हृदय में निवास करता है और मनुष्य उसे इध्र-उध्र ढूँढ़ता पिफरता है अर्थात मनुष्य अपने भीतर ईश्वर को न ढूँढ़कर उसे प्राप्त करने के लिए स्थान-स्थान पर यानी मंदिर-मस्जिद में भटकता रहता है।

काव्य-सौंदर्य:
 भाव पक्ष:

  • कबीर ने ईश्वर का स्थायी निवास मनुष्य के हृदय को ही बताया है।
  • मृग का उदाहरण देकर बात को पूर्ण रूप से स्पष्ट किया गया है।

कला पक्ष:

  • सरल एवं सहज सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया गया है।
  • कस्तूरी-वुंफडलि', 'दुनिया-देखै' में अनुप्रास अलंकार है।
  • 'घटि-घटि' में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

3.

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँध्यिारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि।।

व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मेरे अंदर अहंकार था, तब तक मुझे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई थी। अब जब कि मेरे अंदर का अहं मिट चुका है, तब मुझे ईश्वर की प्राप्ति हो गई है। जब मैंने ज्ञान रूपी दीपक के दर्शन कर लिए, तब अज्ञान रूपी अंध्कार मिट गया अर्थात अहं भाव को त्याग कर ही मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है।
काव्य-सौंदर्य:
 भाव पक्ष:

  • इसमें ईश्वर-प्राप्ति का उपाय बताया गया है।
  • 'अहं' भाव को ईश्वर-प्राप्ति में बाध्क बताया गया है।

कला पक्ष:

  • 'मैं' शब्द अहंभाव के लिए प्रयोग किया गया है।
  • 'हरि है', 'दीपक देख्या' में अनुप्रास अलंकार है।
  • 'अँध्यिारा' अज्ञान का प्रतीक है और 'दीपक' ज्ञान का प्रतीक।

4. 

सुखिया सब संसार है, खायै अरू सोवै।
 दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै।।

व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि यह संसार सुखी है क्योंकि यह केवल खाने और सोने का काम करता है अर्थात सब प्रकार की ¯चताओं से परे है। इनमें दुखी केवल कबीरदास हैं क्योंकि वे ही जागते हैं और रोते हैं। आशय यह है कि सांसारिक सुखों में व्यस्त रहने वाले व्यक्ति सुखपूर्वक समय व्यतीत करते हैं और जो प्रभु के वियोग में जागते रहते हैं, उन्हें कहीं भी चैन नहीं मिलता। वे तो केवल संसार की दशा देखकर रोते रहते हैं। चिंतनशील मनुष्य कभी भी चैन की नींद नहीं सो सकता।

काव्य-सौंदर्य:
 भाव पक्ष:

  • चिंतनशील  मनुष्य की व्याकुलता को प्रकाशित किया गया है।

कला पक्ष:

  • भाषा सहज-सरल है और भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।
  • 'सुखिया सब संसार', 'दुखिया दास' में अनुप्रास अलंकार है।
  • सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग हुआ है।

5.
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्रा न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ।।

व्याख्या: कबीरदास जी विरही मनुष्य की मनःस्थिति की चर्चा करते हुए कहते हैं कि विरह रूपी सर्प शरीर में निवास करता है। उस पर किसी प्रकार का उपाय या मंत्र भी असर नहीं करता। उसी प्रकार राम यानी ईश्वर के वियोग में मनुष्य भी जीवित नहीं रह सकता। यदि वह जीवित रह भी जाता है तो उसकी स्थिति पागल व्यक्ति जैसी हो जाती है।
काव्य-सौंदर्य:
 भाव पक्ष:

  • राम-वियोगी मनुष्य की दशा का मार्मिक चित्राण किया गया है।
  • विरह की तुलना सर्प से की गई है।

कला पक्ष:

  • भाषा सरस-सरल और भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।
  • 'बिरह भुवंगम' में रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है।
  • सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया गया है।

6. 
 निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
 बिन साबण पाँणीं बिना, निरमल करै सुभाइ।।

व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि निंदा करने वाले व्यक्ति को अपने पास रखना ही चाहिए, हो सके तो उसे अपने आँगन में कुटिया 'झोंपड़ी' बनाकर रखना चाहिए। वह हमें साबुन और पानी के प्रयोग के बिना ही हमारे स्वभाव को स्वच्छ कर देता है अर्थात अपनी निंदा सुनकर हम अपनी त्राुटियों को सुधर लेते हैं। इससे हमारी स्वभावगत बुराइयाँ दूर हो जाती हैं।

काव्य-सौंदर्य:
 भाव पक्ष:

  • इसमें निंदक के महत्व को दर्शाया गया है।
  • निंदक को अपना परम हितैषी समझना चाहिए।

कला पक्ष:

  • भाषा सहज एवं सरल है तथा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।
  • 'निंदक-नेड़ा' में अनुप्रास अलंकार है।
  • सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया गया है।

7.
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐके अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ।।

शब्दार्थ: पोथी = पुस्तक, ग्रंथ, पढ़ि-पढ़ि = पढ़-पढ़ कर, जग = संसार, मुवा = मर गया, भया = हुआ, बना, ऐके = एक ही,
कोइ = कोई, अषिर = अक्षर, पीव = प्रियतम, ईश्वर।

व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि यह संसार पुस्तकें पढ़-पढ़ कर मृत्यु को प्राप्त हो गया, परंतु अभी तक कोई भी पंडित नहीं बन सका। यदि मनुष्य ईश्वर-भक्ति का एक अक्षर भी पढ़ लेता तो वह अवश्य ही पंडित बन जाता अर्थात ईश्वर ही एकमात्र सत्य है, इसे जानने वाला ही वास्तविक ज्ञानी और पंडित होता है।

काव्य-सौंदर्य:
 भाव पक्ष:

  • ईश्वर-प्रेम तथा ईश्वर-भक्ति से ही ज्ञान-प्राप्ति होती है।
  • पुस्तकों को पढ़कर 'रट कर' ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं है।

कला पक्ष:

  • भाषा सहज एवं सरल है तथा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।
  • 'पोथी पढ़ि पढ़ि' में अनुप्रास अलंकार है।
  • सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया गया है।

8.
हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि।।

शब्दार्थ: जाल्या = जलाया, आपणाँ = अपना, मुराड़ा = जलती हुई लकड़ी, जालौं = जलाउँ, तास का = उसका, जे = जो।

व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि हमने पहले अपना घर जलाया, पिफर जलती हुई लकड़ी को हाथ में ले लिया। अब हम उसका घर जलाएँगे, जो हमारे साथ चलेगा अर्थात पहले हम ने अपने घर की बुराइयाँ नष्ट की और अब हम अपने साथियों की बुराइयाँ दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाने चल पड़े हैं।

काव्य-सौंदर्य:
भाव पक्ष:

  • कबीरदास जी समाज को सुधरने का महान कार्य करना चाहते हैं।
  • वे चारों ओर ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित करना चाहते हैं।

कला पक्ष:

  • भाषा सहज एवं सरल है तथा भावाभिव्यक्ति में सक्षम है।
  • घर एवं मशाल का प्रतीकात्मक प्रयोग किया गया है।
  • सधुक्कड़ी भाषा और प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

Unit Test (Solutions): साखी

समय: 1 घंटा

पूर्णांक: 30

निर्देश: सभी प्रश्नों का प्रयास करें।

  • प्रश्न संख्या 1 से 5 तक 1 अंक का प्रत्येक प्रश्न है।
  • प्रश्न संख्या 6 से 8 तक 2 अंक का प्रत्यक्ष प्रश्न है।
  • प्रश्न संख्या 9 से 11 तक 3 अंक का प्रत्येक प्रश्न है।
  • प्रश्न संख्या 12 और 13 प्रत्येक 5 अंक का प्रश्न है।

प्रश्न 1: कबीर का जन्म कब और कहाँ माना जाता है? (1 अंक)

(i) 1398, काशी में

(ii) 1518, मगहर में

(iii) 1888, तिरुचिरापल्ली में

(iv) 1952, नालंदा में

उत्तर: (i)

कबीर का जन्म 1398 में काशी में हुआ माना जाता है।

प्रश्न 2: कबीर की भाषा को क्या कहा जाता है? (1 अंक)

(i) संस्कृत

(ii) पचमेल खिचड़ी या सधुक्कड़ी

(iii) अवधी

(iv) भोजपुरी

उत्तर: (ii)

कबीर की भाषा को 'पचमेल खिचड़ी' या 'सधुक्कड़ी' कहा जाता है, क्योंकि इसमें अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी आदि भाषाओं का मिश्रण है।

प्रश्न 3: कबीर के अनुसार ईश्वर कैसा है? (1 अंक)

(i) साकार और विकार युक्त

(ii) निर्विकार और अरूप

(iii) बहुरूपी

(iv) दृश्यमान

उत्तर: (ii)

कबीर के अनुसार ईश्वर एक है, निर्विकार है और अरूप है।

प्रश्न 4: 'साखी' शब्द किसका तद्भव रूप है? (1 अंक)

(i) साक्षी

(ii) साक्ष्य

(iii) सखी

(iv) शाखा

उत्तर: (i)

'साखी' शब्द 'साक्षी' का तद्भव रूप है, जिसका अर्थ प्रत्यक्ष ज्ञान या साक्ष्य होता है।

प्रश्न 5: कबीर ने किसे अधिक महत्व दिया? (1 अंक)

(i) शास्त्रीय ज्ञान

(ii) अनुभव ज्ञान

(iii) राजनीतिक ज्ञान

(iv) सामाजिक ज्ञान

उत्तर: (ii)

कबीर ने शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा अनुभव ज्ञान को अधिक महत्व दिया।

प्रश्न 6: "ऐसी वाणी बोलिए..." साखी का भाव संक्षेप में लिखिए। (2 अंक)

उत्तर: कबीर कहते हैं कि मन का अहंकार छोड़कर मीठी और विनम्र वाणी बोलनी चाहिए। ऐसी वाणी से बोलने वाले का मन शीतल होता है और सुनने वाले को भी सुख मिलता है। इससे प्रेम और सद्भाव बढ़ता है।

प्रश्न 7: निंदक को निकट रखने से क्या लाभ है? संक्षेप में वर्णन कीजिए। (2 अंक)

उत्तर: कबीर कहते हैं कि निंदक को निकट रखो, आँगन में कुटी बनाकर। वह बिना साबुन-पानी के स्वभाव को निर्मल कर देता है, क्योंकि उसकी निंदा से व्यक्ति अपनी कमियों को जानकर सुधार करता है।

प्रश्न 8: सांसारिक सुख-दुख पर कबीर का क्या मत है? (2 अंक)

उत्तर: कबीर कहते हैं कि संसार के लोग खाकर सोकर सुखी हैं, जबकि दास कबीर जागकर रोते हैं। यहाँ 'सोना' अज्ञान और 'जागना' आत्मचिंतन का प्रतीक है। सांसारिक सुख भ्रम है, सच्चा दुख आत्मज्ञान की खोज में है।

प्रश्न 9: 'कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माँहि' साखी का भाव विस्तार से समझाएँ। (3 अंक)

उत्तर: कबीर कहते हैं कि कस्तूरी हिरण की नाभि में बसती है, पर वह उसे बाहर जंगल में ढूँढता फिरता है। इसी तरह ईश्वर कण-कण में, हर घट में व्याप्त है, पर दुनिया उसे बाहर ढूँढती है और देख नहीं पाती। यह साखी आत्मा में ईश्वर के निवास की ओर इशारा करती है, बाहरी खोज व्यर्थ है।

प्रश्न 10: कबीर की साखियों में प्रयुक्त भाषा की विशेषताएँ बताएँ। (3 अंक)

उत्तर: कबीर की भाषा सरल, सहज और जनसामान्य की है। इसमें अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी आदि भाषाओं का मिश्रण है, इसलिए इसे 'पचमेल खिचड़ी' या 'सधुक्कड़ी' कहते हैं। मुहावरे, लोकोक्तियाँ और दोहा छंद का प्रयोग इसे प्रभावशाली बनाता है। यह जनचेतना जगाने वाली है।

प्रश्न 11: 'पौथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ' का अर्थ स्पष्ट कीजिए। (3 अंक)

उत्तर: कबीर कहते हैं कि लोग किताबें (पोथी) पढ़-पढ़कर मर गए, पर कोई सच्चा पंडित नहीं बना। सच्चा पंडित बनने के लिए केवल एक अक्षर 'प्रेम' का पढ़ना (अनुभव करना) काफी है। यह शास्त्रीय ज्ञान की बजाय प्रेम और अनुभव ज्ञान की महत्ता बताता है।

प्रश्न 12: कबीर की साखियों से हमें क्या शिक्षा मिलती है? विस्तार से समझाएँ। (5 अंक)

उत्तर: कबीर की साखियाँ हमें मीठी वाणी बोलने, अहंकार त्यागने, निंदा से सुधार करने, ईश्वर को आत्मा में खोजने, शास्त्रीय ज्ञान से अधिक अनुभव और प्रेम को महत्व देने की शिक्षा देती हैं। वे धर्म के बाह्याडंबरों की निंदा करती हैं और सच्ची भक्ति, सत्संग तथा आत्मचिंतन पर बल देती हैं। सांसारिक सुखों को भ्रम बताकर जागृति की प्रेरणा देती हैं। ये साखियाँ सामाजिक सुधार, सहिष्णुता और ईश्वर की एकता का संदेश देती हैं, जो आज भी प्रासंगिक हैं।

प्रश्न 13: कबीर के चरित्र की विशेषताएँ उदाहरण सहित बताएँ। (5 अंक)

उत्तर: कबीर क्रांतदर्शी, समाज सुधारक, अनुभववादी और निर्भीक थे। वे धर्म के बाह्याडंबरों पर तीखी चोट करते थे, जैसे पोथी पढ़ने को व्यर्थ बताना। ईश्वर को कण-कण में देखने की शिक्षा देना उनकी व्यापक दृष्टि दिखाता है। निंदक को निकट रखने की सलाह से उनकी सुधारवादी सोच झलकती है। विरह को साँप से तुलना कर भक्ति की गहनता व्यक्त की। मीठी वाणी और अहंकार त्याग की शिक्षा से उनकी सरलता और मानवता प्रेम उजागर होता है। मगहर में मृत्यु स्वीकार कर अंधविश्वासों को चुनौती दी। ये गुण उन्हें महान संत बनाते हैं।

Short Question Answers: साखी

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1: कबीर की साखी के सदंर्भ में स्पष्ट कीजिए कि मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है ? 
उत्तरः
मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता प्राप्त होती है, क्योंकि मीठी वाणी सुनने में मधुर होती है जिसे सुनकर हमारा तन और मन प्रसन्न होता है। उसका प्रभाव व्यक्ति को संतोष एवं शान्ति प्रदान करता है। मीठी वाणी से सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित करके असंभव कार्य को भी संभव किया जा सकता है।


प्रश्न 2: ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते ? कबीर की साखी के सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः
ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे नहीं देख पाते हैं क्योंकि मनुष्य अहंकारी, अज्ञानी व अविश्वासी है और स्वयं को इस संसार में महत्त्वपूर्ण मानता है।


प्रश्न 3: 'कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़े वन माँहि।' इस पंक्ति द्वारा कबीर क्या संदेश देना चाहते हैं ? 
उत्तरः
इस पंक्ति द्वारा कबीर यह संदेश देना चाहते हैं कि जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में स्थित रहती है किन्तु मृग इस तथ्य को जानता नहीं और वह उसे जंगल में ढूंढ़ता फिरता है। उसी प्रकार परमात्मा मनुष्य के हृदय में स्थित है परन्तु वह उसे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या अन्य तीर्थों पर खोजता फिरता है।


प्रश्न 4: संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुःखी कौन ? यहाँ 'सोना' और 'जागना' किसके प्रतीक हैं ? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है ? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तरः
संसार में सुखी व्यक्ति वह है जो आनंदपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहा है। जो सुखी नहीं है, जिसके जीवन में आनंद नहीं है वह कबीर के अनुसार दुःखी है।
यहाँ सोने का अर्थ अज्ञानता की 'नींद' से है और जागना 'ज्ञान से युक्त' होने का प्रतीक है। इसका प्रयोग 'साखी' में अर्थ, सौंदर्य एवं संसार की नश्वरता, ईश्वर भक्ति के लिए किया गया है।


प्रश्न 5: कबीर के अनुसार, इस संसार में कौन दुःखी है, कौन सुखी ?
उत्तरः कबीर के अनुसार, इस संसार में सुखी वह है, जो अज्ञानी है। इसलिए वह संसार को ही अन्तिम सत्य मानकर उसे भोगता है और सुख अनुभव करता है। दूसरी ओर जो प्रभु के रहस्य को जान लेता है, वह विरह के कारण दिन-रात तड़पता है। इसलिए वह संसार की दृष्टि से दुःखी है।


प्रश्न 6: कबीर के अनुसार 'निन्दक' किस प्रकार हमारे स्वभाव को निखारने में सहायक होता है ? वे निन्दक के साथ कैसा व्यवहार करने का सुझाव देते हैं ? 
उत्तरः
निन्दक अपनी आलोचनाओं से हमें हमारी बुराइयों का ज्ञान कराता है और हम उन्हें दूर कर लेते हैं। बुराइयों के दूर हो जाने से हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है, मन के सारे कलुष मिट जाते हैं। निंदक बिना साबुन-पानी का प्रयोग किए, अपनी आलोचनाओं से चित्त को निर्मल कर देता है। इसलिए कबीर निंदक को अपने निकट ही रखने का सुझाव देते हैं।


प्रश्न 7: कबीर के विचार से निन्दक को निकट रखने के क्या-क्या लाभ हैं ?
उत्तरः
कबीर के विचार से निंदक को निकट रखने से निम्नलिखित लाभ हैं-
(क) निंदक निकट रहने पर बिना साबुन एवं पानी के हमारे स्वभाव को स्वच्छ तथा निर्मल करता है।
(ख) आलोचक हमारी कमजोरियाँ उजागर करता है, जिनको हम सुधार कर दूर कर लेते हैं।
(ग) बुराइयाँ दूर होने पर मनुष्य उच्च पद को प्राप्त करने योग्य बन जाता है।


प्रश्न 8: कबीर के अनुसार निन्दक कौन होता है ? उन्होंने उसे अपना सबसे बड़ा शुभचिंतक क्यों माना है ? 
उत्तरः
निन्दक का कार्य हमेशा लोगों की निन्दा करना होता है। कबीर के अनुसार हमें सहनशील होकर अपनी निन्दा सुननी चाहिए। जब निन्दक उँगली उठाकर हमारी गलतियों के प्रति सचेत करता है तब हम अपने व्यवहार संबंधी दोषों के प्रति सतर्क हो जाते हैं और उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं।


प्रश्न 9: 'एकै आषिर पीव का' पढ़ै सु पंडित होइ'-इस पंक्ति के द्वारा कवि क्या कहना चाहता है ?
उत्तरः
'एकै आषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ।'-इस पंक्ति के द्वारा कवि यह कहना चाहता है जिस व्यक्ति ने प्रेम के एक अक्षर को पढ़ लिया है, वह विद्वान् हो जाता है। अर्थात् जिसने प्रेम का व्यावहारिक अनुभव (ज्ञान) प्राप्त कर लिया है, वही संसार में सबसे बड़ा विद्वान् है।


प्रश्न 10: कबीर के अनुसार संसार में क्या व्यर्थ है ? 
उत्तरः
कबीर के अनुसार पुस्तकीय ज्ञान व्यर्थ है। इसे पढ़कर कोई भी व्यक्ति ज्ञानी नहीं बनता। इसी प्रकार मुँह मुँड़ाना, राम-नाम का जप करना आदि भी व्यर्थ है। राम के ज्ञान के बिना इनका कोई मूल्य नहीं है।


प्रश्न 11:  कबीर की उद्धत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए। 
उत्तरः
कबीर की साखियों की भाषा की विशेषता है कि यह जन-जन की भाषा है। उन्होंने जन चेतना और जन भावनाओं को अपनी सधुक्कड़ी भाषा द्वारा साखियों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया है। अपनी चमत्कारिक भाषा के कारण आज भी इनके दोहे लोगों की जुबान पर हैं।


प्रश्न 12: अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है ?
अथवा
कबीर ने निन्दकों को अपने समीप रखने की बात क्यों कही है ? 
उत्तरः अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए, कबीर ने यह उपाय सुझाया है कि हम अपने निंदक (आलोचकों) को अपने समीप रखें, जो समय-समय पर हमारी कमियों को बताकर हमारे स्वभाव को निर्मल रखे।


प्रश्न 13: कबीर के अनुसार, सच्चा ज्ञान क्या है ? 
उत्तरः कबीर के अनुसार, सच्चा ज्ञान पुस्तकों से प्राप्त नहीं होता है। पुस्तकें पढ़-पढ़ कर तो लोग जीवन को व्यर्थ ही गँवाते हैं। सच्चा ज्ञान 'पी' अर्थात् प्रिय से प्राप्त होता है अर्थात् जब हम 'प्रिय' अर्थात् 'परमात्मा' से प्रेम करना सीख जाते हैं तो हमें सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है।


प्रश्न 14: कवि किस ज्ञान को वास्तविक ज्ञान मानते हैं? 
उत्तरः कवि के अनुसार वास्तविक ज्ञान वह ज्ञान है जिससे मानव के मन में मानव के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है।


प्रश्न 15: 'घर जाल्या आपणाँ, से क्या तात्पर्य है? 
उत्तरः 'घर जाल्या आपणाँ, के माध्यम से कवि मनुष्य को 'भौतिक आकर्षणों' से विमुख करना चाहते हैं और मनुष्य को ज्ञान मार्ग की ओर अग्रसर होने का संदेश देना चाहते हैं।

Class 10 Hindi Mind Map: साखी


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